RSS Centenary Advertisements Cost : भारत की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाले केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के खजाने से जुड़ी एक ऐसी जानकारी सामने आई है, जिसने देश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। एक आरटीआई (RTI) आवेदन के जरिए प्राप्त दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ है कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2025 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में जारी किए गए विज्ञापनों पर 76,13,129 रुपये की बड़ी राशि खर्च की है। यह जानकारी ऐसे समय में आई है जब सरकारी धन के उपयोग की प्राथमिकताओं को लेकर विपक्षी दल और सामाजिक कार्यकर्ता लगातार सवाल उठाते रहे हैं।

आरटीआई कार्यकर्ता अजय वासुदेव बोस द्वारा प्राप्त आधिकारिक रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि करते हैं कि मंत्रालय ने संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर व्यापक प्रचार-प्रसार अभियान चलाया था। ज्ञात हो कि केशव बलीराम हेडगेवार द्वारा 1925 में स्थापित आरएसएस ने अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने पर देश भर में भव्य कार्यक्रम आयोजित किए थे। इन कार्यक्रमों की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद एक मुख्य कार्यक्रम में शिरकत की थी, जहाँ उन्होंने संगठन की राष्ट्र-निर्माण में भूमिका की सराहना करते हुए एक विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट भी जारी किया था।

प्रशासनिक और कानूनी दृष्टिकोण से यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि आलोचक इसे सार्वजनिक धन का अनुचित उपयोग बता रहे हैं। विरोधियों का तर्क है कि आरएसएस एक गैर-पंजीकृत संगठन है जो सीधे तौर पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) से वैचारिक रूप से जुड़ा है। ऐसे में किसी एक विशेष संगठन के स्थापना दिवस पर सरकारी खजाने से लाखों रुपये का विज्ञापन खर्च करना वित्तीय नैतिकता के मानकों पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, सरकारी तंत्र का एक वर्ग इसे भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के प्रचार के रूप में देख रहा है, जिसका उद्देश्य राष्ट्र-निर्माण के विभिन्न पहलुओं से जनता को अवगत कराना था।

16 अप्रैल 2026 तक की स्थिति के अनुसार, इस पूरे विवाद पर संस्कृति मंत्रालय, आरएसएस या भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। चुप्पी का यह दौर इस मुद्दे को और अधिक हवा दे रहा है। यह घटनाक्रम केवल एक वित्तीय आंकड़े का खुलासा नहीं है, बल्कि यह उन मूलभूत प्रश्नों को भी पुनर्जीवित करता है कि सरकार और वैचारिक संगठनों के बीच की सीमा रेखा कितनी स्पष्ट होनी चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार इस खर्च का विधिवत ब्यौरा सार्वजनिक करती है या यह मुद्दा एक बड़े राजनीतिक टकराव का रूप लेता है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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