मुहर्रम के मातम में क्यों शामिल नहीं होते सुन्नी मुसलमान? आखिर मुहर्रम पर क्यों रखा जाता है रोज़ा?
जानिए आखिर क्यों सुन्नी मुसलमान मुहर्रम के जुलूसों और मातम से दूरी बनाए रखते हैं? इसके पीछे की शरीयत और बिदअत की मान्यताओं के साथ-साथ जानिए आशूरा पर पैगंबर की सुन्नत के अनुसार दो दिनों के रोजे रखने का वह ऐतिहासिक और पवित्र सच।

इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम को लेकर अक्सर आम लोगों के जेहन में कई तरह के सवाल उठते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख यह है कि आखिर सुन्नी मुसलमान मुहर्रम के जुलूसों और मातम में शामिल क्यों नहीं होते और इस अवसर पर उनके रोजा रखने का क्या महत्व है। दरअसल, मुहर्रम के दौरान सुन्नी समुदाय की मान्यताएं और उनकी धार्मिक प्रथाएं एक विशेष व्यवस्था और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित हैं। सुन्नी मुसलमान मुहर्रम के जुलूसों और मातम में इसलिए शामिल नहीं होते क्योंकि वे इसे शरीयत के खिलाफ यानी बिदअत (नई प्रथा) मानते हैं। इसके बजाय, यह समुदाय मुहर्रम के 10वें दिन जिसे आशूरा कहा जाता है, उसके साथ-साथ 9वें या 11वें दिन पैगंबर हजरत मुहम्मद की सुन्नत अर्थात परंपरा का पूरी निष्ठा से पालन करते हुए रोजा (उपवास) रखता है।
धार्मिक और पारंपरिक दृष्टिकोण से मुहर्रम के जुलूसों में शामिल न होने के पीछे गहरी इस्लामी शिक्षाएं निहित हैं। सुन्नी मान्यता के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद ने किसी की भी शहादत या दुख में छाती पीटने, मातम मनाने या इस तरह के जुलूस निकालने की शिक्षा कभी नहीं दी है। सुन्नी उलेमाओं का स्पष्ट रूप से मानना है कि कर्बला के ऐतिहासिक मैदान में हजरत इमाम हुसैन की शहादत के गम को इस तरह प्रकट करने के बजाय, उनके द्वारा दिखाए गए न्याय और सच्चाई के मार्ग पर चलना तथा अल्लाह की इबादत में लीन रहना ही सच्चा और सही तरीका है। इस समुदाय के लिए यह समय सब्र और सबाब का है, जिसमें वे इमाम हुसैन के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने पर बल देते हैं।
दूसरी ओर, मुहर्रम यानी आशूरा के मौके पर रोजा रखने का सुन्नी समुदाय में एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक महत्व है। हदीस के प्रामाणिक संदर्भों के अनुसार, जब पैगंबर मुहम्मद मदीना पहुंचे, तो उन्होंने वहां के यहूदियों को 10 मुहर्रम (आशूरा) के दिन रोजा रखते हुए देखा। जब इसके पीछे का कारण पूछा गया, तो पता चला कि इसी पावन दिन अल्लाह ने हजरत मूसा (Moses) और उनकी कौम को क्रूर फिरौन के जुल्मों-सितम से निजात दिलाई थी। इसी ऐतिहासिक खुशी और अल्लाह के प्रति शुक्राने (धन्यवाद) के तौर पर हजरत मूसा रोजा रखा करते थे।
इस ऐतिहासिक घटना को जानने के बाद पैगंबर मुहम्मद ने फरमाया कि मुसलमान हजरत मूसा के सम्मान के अधिक हकदार हैं। इसके बाद उन्होंने स्वयं भी इस पवित्र दिन रोजा रखा और अपने अनुयायियों को भी मुहर्रम पर रोजा रखने का हुक्म दिया। इसके साथ ही, यहूदियों की परंपरा से अपनी एक अलग धार्मिक पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से पैगंबर मुहम्मद ने मुसलमानों को विशेष हिदायत दी कि वे केवल 10 मुहर्रम को ही नहीं, बल्कि उसके साथ 9 मुहर्रम या फिर 11 मुहर्रम को भी रोजा रखें, ताकि लगातार दो दिनों का रोजा पूरा हो सके और यह परंपरा विशिष्ट बनी रहे।
इस प्रकार, मुहर्रम का यह अवसर सुन्नी समुदाय के लिए मातम और जुलूस का जरिया न बनकर पैगंबर की सुन्नत को जीवित रखने, हजरत मूसा की ऐतिहासिक मुक्ति का शुक्राना अदा करने और इमाम हुसैन की शहादत के वास्तविक संदेश यानी न्याय और सब्र को आत्मसात करने का एक पावन जरिया बनता है।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
