दिल्ली के लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाले महीनों में बिजली का खर्च बढ़ने वाला है। दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (DERC) ने फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज (FPPAS), जिसे पावर परचेज एडजस्टमेंट कॉस्ट (PPAC) भी कहा जाता है, में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है। इस निर्णय के बाद राजधानी में बिजली वितरण कंपनियां अपने बढ़े हुए खर्च की भरपाई उपभोक्ताओं से कर सकेंगी, जिसका सीधा असर मासिक बिजली बिलों पर दिखाई देगा।

दरअसल, दिल्ली की बिजली वितरण कंपनियों ने आयोग के समक्ष यह तर्क रखा था कि बिजली खरीदने की लागत में लगातार वृद्धि हुई है। इसके साथ ही बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं और ट्रांसमिशन तथा परिचालन खर्चों में भी उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। इन बढ़ी हुई लागतों का बोझ कंपनियों पर पड़ रहा था, जिसके चलते उन्होंने अतिरिक्त खर्च की वसूली की अनुमति मांगी थी।

DERC ने आधारभूत बिजली दरों में तत्काल बढ़ोतरी करने के बजाय PPAC और FPPAS जैसे समायोजन शुल्कों के माध्यम से इन लागतों की भरपाई की अनुमति दी है। इसका अर्थ यह है कि उपभोक्ताओं के बिजली बिलों में अलग से सरचार्ज जोड़ा जाएगा, जिससे कुल भुगतान राशि बढ़ जाएगी। हालांकि मूल टैरिफ में कोई सीधी वृद्धि नहीं की गई है, लेकिन अतिरिक्त शुल्क के कारण उपभोक्ताओं को अधिक भुगतान करना होगा।

इस फैसले का सबसे अधिक असर उन उपभोक्ताओं पर पड़ने की संभावना है जिनकी मासिक बिजली खपत 500 यूनिट से अधिक है। रिपोर्टों के अनुसार, ऐसे परिवारों के बिजली बिल में लगभग 5 प्रतिशत या उससे अधिक की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। वहीं कम बिजली खपत करने वाले उपभोक्ताओं पर इसका प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित रह सकता है, विशेषकर उन परिवारों पर जो दिल्ली सरकार की बिजली सब्सिडी योजना का लाभ उठा रहे हैं।

यदि किसी उपभोक्ता का वर्तमान मासिक बिजली बिल 2,000 रुपये है, तो लगभग 5 प्रतिशत वृद्धि के बाद उसे करीब 2,100 रुपये का भुगतान करना पड़ सकता है। इसी तरह 3,000 रुपये के बिल पर लगभग 150 रुपये अतिरिक्त जुड़ सकते हैं, जबकि 5,000 रुपये के बिल वाले उपभोक्ताओं को करीब 250 रुपये अधिक चुकाने पड़ सकते हैं। हालांकि वास्तविक बढ़ोतरी संबंधित डिस्कॉम, बिजली खपत, लागू सब्सिडी और अन्य शुल्कों के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।

दिल्ली में बिजली आपूर्ति का जिम्मा संभालने वाली प्रमुख कंपनियों, जिनमें बीएसईएस राजधनी, बीएसईएस यमुना और टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन शामिल हैं, के उपभोक्ताओं पर इस फैसले का प्रभाव पड़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती ऊर्जा लागत और बिजली खरीद व्यय के बीच यह कदम वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति को संतुलित करने की दिशा में उठाया गया है।

हालांकि चिंता की बात यह है कि यह बढ़ोतरी भविष्य में आने वाले संभावित दबावों की केवल शुरुआत हो सकती है। दिल्ली में लगभग 38,552 करोड़ रुपये की नियामक परिसंपत्तियों यानी ऐसे खर्चों का मुद्दा भी लंबित है जिनकी अब तक पूरी तरह वसूली नहीं हो पाई है। इस मामले से जुड़े नियामकीय और न्यायाधिकरण स्तर के निर्णय आने वाले समय में बिजली दरों पर अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकते हैं। ऐसे में विशेषज्ञ यह संभावना भी जता रहे हैं कि वर्ष 2026 के दौरान आगे और टैरिफ संशोधन देखने को मिल सकते हैं।

DERC का यह फैसला केवल एक प्रशासनिक या वित्तीय निर्णय नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव राजधानी के लाखों परिवारों और व्यवसायों के मासिक बजट पर पड़ने वाला है। बढ़ती ऊर्जा लागतों के दौर में यह निर्णय उपभोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि आने वाले समय में बिजली खर्च को लेकर अधिक सतर्क और योजनाबद्ध दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता हो सकती है।

Manyaa Chaudhary

Manyaa Chaudhary

यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।

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