व्यक्ति का स्वभाव सरल और भक्ति कठिन होनी चाहिए: संत दिग्विजय राम ने शिव पुराण कथा में दिया संदेश
बड़ी सादड़ी श्री रामद्वारा में शिव पुराण कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने प्रभु नाम सुमिरन, आत्मिक जीवन और कलयुग पर संदेश दिया।

तस्वीर में संत दिग्विजय राम श्री रामद्वारा में शिव पुराण कथा के दौरान प्रवचन देते हुए दिखाई दे रहे हैं।
बड़ी सादड़ी (चित्तौड़गढ़) स्थित श्री रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने जीवन, धर्म और प्रभु भक्ति के महत्व पर प्रवचन देते हुए कहा कि व्यक्ति का स्वभाव सरल और भक्ति कठिन होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सोना जितना तपता है, उतना ही निखरता है। इसी प्रकार जीवन में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों को प्रभु कृपा मानकर स्वीकार करना चाहिए।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि व्यक्ति को आत्मिक स्तर पर जीवन जीना चाहिए और इसका एकमात्र उपाय है कि जब भी समय मिले प्रभु का स्मरण करते रहें। सुख हो या दुख, दोनों को प्रभु का प्रसाद मानकर स्वीकार करना चाहिए। यदि परिस्थितियां अनुकूल हैं तो उसे प्रभु कृपा मानना चाहिए और यदि परिस्थितियां प्रतिकूल हैं तो उसे प्रभु इच्छा समझकर स्वीकार करना चाहिए। जो व्यक्ति इस भाव को अपना लेता है, उसे जीवन में सुख-दुख का अनुभव नहीं होता।
उन्होंने कहा कि वर्तमान कलयुग में व्यक्ति दैहिक स्तर पर जीवन जी रहा है, जबकि उसे आत्मिक स्तर पर जीना चाहिए। व्यक्ति 24 घंटे अपने शरीर को निहारता है, लेकिन आत्मा के अंदर झांकने का प्रयास नहीं करता। आत्मा के अंदर जाने के लिए व्यक्ति को सत्संग करना चाहिए।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि आज के समय में रुपया उतना नहीं गिरता है, जितना इंसान रुपए के लिए गिर जाता है। अपने धर्म को छोड़कर व्यक्ति धन के पीछे न जाने कहां-कहां भटकता रहता है। कलयुग ने सभी जीवों के जीवन को प्रभावित किया है और मर्यादा का नाश हो गया है। उन्होंने कहा कि पहले घरों में बड़ों का सम्मान किया जाता था और बेटा पिता से डरता था, लेकिन कलयुग के प्रभाव के कारण अब कई बार पिता बेटे से डरता है। स्वार्थ के लिए व्यक्ति इतने निम्न स्तर तक गिर जाता है कि उसे समाज और परिवार का भी भय नहीं रहता।
उन्होंने कहा कि कलयुग में एक सबसे बड़ी अच्छाई यह है कि केवल प्रभु नाम का सुमिरन करने मात्र से व्यक्ति इसके प्रभाव से बच सकता है। इसलिए व्यक्ति को प्रभु नाम का आश्रय लेना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि सतयुग में ध्यान से, त्रेता युग में यज्ञ से, द्वापर युग में विधिवत पूजा से और कलयुग में नाम सुमिरन से प्रभु को प्राप्त किया जा सकता है। पवित्र मन से प्रभु का नाम लेने से व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि आज दुनिया नहीं बदली है, बल्कि व्यक्ति ने अपनी सोच बदल ली है। शिव पुराण में बताया गया है कि कलयुग में संतान माता-पिता के प्रति श्रद्धाविहीन हो जाएंगी, दुष्ट प्रवृत्ति की संताने पैदा होंगी और संताने माता-पिता को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देंगी। व्यक्ति का शरीर रोगग्रस्त रहेगा। उन्होंने कहा कि आज इन बातों को प्रत्यक्ष रूप से देखा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि एक समय था जब व्यक्ति कहता था कि मैं झूठ नहीं बोल सकता, लेकिन आज व्यक्ति कहता है कि मैं झूठ बोले बिना इस युग में जी नहीं सकता। इस युग में मीठा झूठ सभी को अच्छा लगता है। व्यक्ति भगवत चिंतन को छोड़कर लोक प्रपंच में उलझ जाता है, यही कलयुग की विशेषताएं हैं।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि कलयुग में हाथों-हाथ प्रतिफल मिल जाता है। कलयुग में लाख दुर्गुण हैं, लेकिन एक अच्छाई यह है कि प्रभु नाम का सुमिरन करने से व्यक्ति का उद्धार हो जाता है। उन्होंने कहा कि शिव पुराण सुनने मात्र से व्यक्ति का कल्याण होता है। इसके अध्ययन और श्रवण मात्र से जीव उत्तम से उत्तम गति को प्राप्त होता है। यदि व्यक्ति शिव पुराण का एक या आधा श्लोक भी सुन ले तो उसके पाप, ताप, परिताप और संताप नष्ट हो जाते हैं।

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